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कैसे इतनी अद्भुत हो गई रामलला की मूर्ति, अचंभित हूं...इंटरव्...

कैसे इतनी अद्भुत हो गई रामलला की मूर्ति, अचंभित हूं...इंटरव्यू में भावुक हो गए अरुण योगीराज

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Excutive Editor

25 जनवरी 2024, सुबह 06:13


अयोध्या: अयोध्या राम मंदिर प्रतिमा निर्माण करने वाले कर्नाटक के मशहूर मूर्तिकार अरुण योगीराज ने ऐसी बात कही है जिस पर आप भी हैरान हो जाएंगे। उन्होंने कहा है कि नवनिर्मित राम मंदिर के गर्भगृह में जो मूर्ति लगाई गई है, वह उन्होंने नहीं बनाई। दरअसल, वे बात को अलग तरीके से कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि गर्भगृह के बाहर तक उनकी मूर्ति की छवि अलग थी। लेकिन, जैसे ही मूर्ति को गर्भगृह में प्रवेश कराया गया, उसकी आभा ही बदल गई। इसे मैंने भी महसूस किया। मैंने गर्भगृह में अपने साथ मौजूद लोगों को भी इस संबंध में कहा था कि यह दैवीय चमत्कार है या कुछ और। लेकिन, मूर्ति में बदलाव हो गया था। एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में अरुण योगीराज ने कहा कि मेरे पूर्वजों की 300 सालों की तपस्या का यह परिणाम है। मुझे शायद ईश्वर ने इसी कार्य के लिए धरती पर भेजा था। मैं इस जन्म में भगवान श्रीरामलला की मूर्ति बनाऊं, यह मेरे प्रारब्ध में था। अभी मैं किन भावनाओं से गुजर रहा हूं यह शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

29 दिसंबर को मिली जानकारी

अरुण योगीराज ने मूर्ति के गर्भगृह में स्थापित किए जाने के मामले पर भी बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट की ओर से मेरी मूर्ति के चयन के बारे में 29 दिसंबर को बताया गया। इसके बाद मैंने प्रभु रामलला की मूर्ति को फिनिशिंग टच देना शुरू कर दिया। रामलला की मूर्ति राम मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की गई। 22 जनवरी को प्रभु रामलला की प्राण प्रतिष्ठा भव्य समारोह के साथ संपन्न हुई। इस दौरान जब देश ने रामलला की अद्भुत छवि देखी। जिस किसी ने रामलला की प्रतिमा देखी, मोहित हुए बिना नहीं रह सका।

लोगों को ध्यान में रखकर निर्माण


अरुण योगीराज कहते हैं कि हर दिन रामलला की मूर्ति का निर्माण करते हुए मैंने लोगों की भावनाओं के बारे में सोचा। मैंने यह महसूस करने की कोशिश की कि प्रभु रामलला मुझे बालरूप में आशीर्वाद देते दिखें। लोगों को उनकी आंखों में देखकर श्रद्धा, भक्ति और आस्था का भाव झलके। इसके लिए मैंने काफी समय बच्चों के साथ बिताया। उनकी मुस्कान के समय उनकी आंखों में आती चमक को समझने की कोशिश की। उनके गालों पर आने वाले उभारों को महसूस किया। इसके आधार मूर्ति को फिनिशिंग टच दिया गया है।

अरुण कहते हैं कि आज जब लोग इस मूर्ति को देखकर मेरी कला की तारीफ कर रहे हैं तो मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं। एक कलाकार के तौर पर इससे अधिक किसी को क्या चाहिए? यह सब मेरे पूर्वजों का आशीर्वाद और हमारे विश्वकर्मा समाज की जादूगरी का परिणाम है। हर कलाकार को इस प्रकार की तारीफ मिले, यही कामना है।

रामलला को देखने आते थे 'हनुमान'?


अरुण योगीराज ने एक बड़ा रोचक किस्सा भी सुनाया। उन्होंने कहा कि हम जब मूर्ति का निर्माण कर रहे थे तो हर दिन शाम को पांच से छह बजे के बीच बंदर वहां पर आते थे। वह आते मूर्ति का काम देखते और चले जाते। कर्मशाला में इस प्रकार से बंदरों के आने से हमलोगों को परेशानी होने लगी। हमारा ध्यान भटक जाता था। हमने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के समक्ष इस बात को रखा। उन्होंने कर्मशाला में घेरा लगवा दिया। वहां दरवाजे लगवा दिए गए। उस दिन शाम को जब बंदर आए और उन्होंने पूरा इलाका बंद पाया तो दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। हमने दरवाजा खोलकर देखा तो एक बंदर को वहां पाया।

अरुण योगीराज ने कहा कि जब हमने दरवाजा खोला तो वह अंदर आए। मूर्ति का निर्माण देखा और चले गए। फिर हमने दरवाजा बंद नहीं किया। अरुण से जब पूछा गया कि क्या एक ही बंदर आते थे? इस पर उन्होंने कहा कि यह मैं नहीं बता सकता, लेकिन बंदर आकर काम देखकर जाते थे। शायद वह अपने आराध्य को मूर्त रूप लेते देखने आते हों।

 

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