मान सिंह गिरोह के शार्प शूटर थे लुक्का, आजादी के बाद बांटे लड्डू लेकिन निराश रहे कि इसके बाद भी नाइंसाफी खत्म नहीं हुई

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भिंड, 13 अगस्त। हमारे देश पर हुकूमत करने वाले अंग्रेजों को सिर्फ महात्मा गांधी और इस देश के क्रांतिकारियों ने ही परेशान नहीं किया, बल्कि हमारे चंबल के बीहड़ों में रहने वाले बागियों ने भी अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। इन बागियों का खौफ इतना था कि अंग्रेज अफसर चंबल के इलाके से गुजरने से पहले सौ बार सोचा करते थे। आगरा से ग्वालियर तक का सफर तय करने में अंग्रेजों के पसीने छूट जाया करते थे। हम बात कर रहे हैं उस डकैत लुक्का की जिसने अंग्रेजों पर जमकर कहर बरपाया।

पिता पर हुए अत्याचार की वजह से डकैत बने थे लोकमन दीक्षित बाह इलाके के महुआ शाला गांव में रहने वाले लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का की कहानी किसी फिल्म की तरह ही है। लोकमन दीक्षित के पिता पर गांव के कुछ दबंग लोगों ने अत्याचार किया। लोकमन दीक्षित के परिवार के साथ मारपीट की। उनके घर का सामान भी लूट लिया। इतना ही नहीं लोकमन दीक्षित के पिता को मारपीट की और उनके पिता को चंबल नदी में फेंक दिया गया। अपने परिवार पर हो रहे अत्याचार को देखकर लोकमन दीक्षित का खून खोल गया और उन्होंने बंदूक थाम कर बीहड़ों का रास्ता अख्तियार कर लिया।

डकैत मानसिंह की गिरोह में हो गए शामिल लोकमन दीक्षित डकैत मानसिंह के गिरोह में लोकमत दीक्षित जाकर शामिल हो गए। इस गिरोह में डकैत रूपा भी मौजूद था। लोकमन दीक्षित ने गिरोह में शामिल होते ही अपने दुश्मनों से बदला लिया और इसके बाद डकैत गिरोह द्वारा की जाने वाली डकैतियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा भी लिया।

डकैत मानसिंह की मौत के बाद गैंग के सरगना बने डकैत लुक्का डकैत मानसिंह की मौत के बाद गिरोह की कमान डकैत लुक्का के हाथों में आ गई। डकैत लुक्का ने गिरोह की कमान संभालते ही गिरोह को अपने हिसाब से चलाना शुरु कर दिया। डकैत लुक्का ने गिरोह के लिए कई नियम और कायदे कानून तय कर दिए और इन्हीं नियम और कायदे कानून के तहत गिरोह को संचालित किया जाने लगा।

अंग्रेजों पर कहर ढहाते रहे डकैत लुक्का अपने देश और मातृभूमि से प्रेम करने वाले डकैत लुक्का के निशाने पर हमेशा अंग्रेज अफसर और अंग्रेजी फौज रहा करती थी। उन्हें जब भी मौका मिलता था तो वह अंग्रेजों पर हमला कर देते थे और उनके हथियार लूट लिया करते थे साथ ही वे अंग्रेजों को चुन चुन कर मार दिया करते थे।

चंबल के इलाके से निकलते वक्त अंग्रेज अफसरों के छूट जाते थे पसीने चंबल के इलाके से निकलते वक्त अंग्रेज अफसरों के पसीने छूट जाया करते थे। जब भी कोई अंग्रेज अफसर आगरा से ग्वालियर के लिए निकलता था तो उसे चंबल का रास्ता भी तय करना पड़ता था। चंबल का रास्ता तय करते वक्त अंग्रेज अफसर के दिल में हमेशा डकैत लुक्का का खौफ बना रहता था। डकैत लुक्का मौका मिलते ही अंग्रेज अफसरों पर हमला कर देता था। ऐसा कई बार हुआ कि अंग्रेज अफसरों ने जहां डेरा जमाया वहां डकैत लुक्का ने हमला कर दिया और अफसरों को मारने के बाद उनके हथियार भी लूट लिए।

अंग्रेज अफसरों ने डकैत लुक्का को पकड़ने के लिए कई प्रयास अंग्रेज अफसर डकैत लुक्का के आतंक से काफी परेशान हो चुके थे। अंग्रेज अफसरों ने अपना नेटवर्क मजबूत करते हुए डकैत लुक्का को पकड़ने के कई असफल प्रयास किए। लाख कोशिशों के बावजूद भी डकैत लुक्का कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आ सके, हालांकि डकैत लुक्का समय-समय पर अंग्रेजों पर अपना कहर जरूर बरपाते रहे। जब देश आजाद हुआ तो डकैत लुक्का ने कई दिनों तक मिठाई बांटकर देश के आजाद होने की खुशियां भी मनाई थीं।

विनोबा भावे के कहने पर कर दिया समर्पण वर्ष 1960 में विनोबा भावे के कहने पर डकैत लुक्का ने गिरोह समेत आत्मसमर्पण कर दिया। अटेर इलाके में यह आत्मसमर्पण किया गया। आत्मसमर्पण करने के बाद लोकमन दीक्षित समाज की मुख्यधारा में वापस लौट आए और भिंड में ही एक घर में निवास करने लगे। पूर्व डकैत लोकमन दीक्षित जब तक जिंदा रहे, तब तक वह पुलिस-प्रशासन की मदद करते रहे। पूर्व डकैत लोकमन दीक्षित के नाती रोहित दीक्षित बताते हैं कि उनके बाबा लोकमत दीक्षित ने तकरीबन 500 डकैतों को आत्मसमर्पण करवाया था। इसके साथ ही वे समय-समय पर कई अपराधों को रोकने में पुलिस की मदद भी करते थे।

99 साल की उम्र में हो गया देहांत पूर्व डकैत लोकमन दीक्षित ने अपना सामाजिक जीवन भी बहुत अच्छे ढंग से जिया। लोकमन दीक्षित के 4 संतानें हुईं। जिनमें से तीन बेटा और एक बेटी थी। लोकमत दीक्षित के वर्तमान में 4 नाती भी है। लोकमत दीक्षित ने साल 2017 में अपनी आखिरी सांस भिंड में ही ली। वर्तमान में लोकमत दीक्षित के दो नाती भिंड में और दो नाती ग्वालियर में निवासरत हैं।

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