राजस्थान की वीरांगना अमृता बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण और बलिदान की बेमिसाल हस्ती..

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सन् 1730 में राजस्थान के मारवाड़ में खेजड़ली नामक स्थान पर जोधपुर के महाराजा द्वारा हरे पेड़ों को काटने से बचाने के लिए, अमृता देवी बेनीवाल ने अपनी तीन बेटियों आसू , रत्नी और भागू के साथ अपने प्राण त्याग दिए। उसके साथ 363 से अधिक अन्य बिश्नोई , खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए मर गए।

अमृता देवी का बलिदान –

वर्तमान में वृक्षारोपण और वृक्षों की सुरक्षा के लिए बड़ी योजनाएँ लागू की जा रही है. इन्ही वृक्षों को बचाने के लिए आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व मारवाड़ के खेजड़ली गाँव में एक घटना घटित हुई. जोधपुर क महाराजा अभयसिंह को अपने नये महल के लिए लकड़ी की जरुरत थी. भाद्रपद शुक्ल दशमी वि.संवत 1787 के दिन महाराजा ने खेजड़ली ग्राम में खेजड़ी के वृक्ष काटने के लिए सैनिक टुकड़ी भेजी.

इस गाँव की एक महिला अमृता देवी विश्नोई ने खेजड़ी वृक्ष काटने का विरोध किया और पेड़ से लिपट गई. उसके साथ उनकी तीन पुत्रियाँ भी थी. अमृता देवी ने कहा कि वृक्ष की रक्षा के लिए वह अपनी जान देने को भी तैयार है. उसने यह कहते हुए सिर आगे कर दिया कि ”सर साटे रुख रहे तो भी सस्तों जाण”

सिर के बदलें वृक्ष बचता है तो भी सस्ता सौदा है. उसकी तीनों पुत्रियाँ की भी यही स्थति रही. महाराजा के सैनिकों ने विरोध करने पर अमृता देवी व उसकी पुत्रियों के सिर घड से अलग कर दिये. उस दिन मंगलवार था जो कि काला मंगलवार के नाम से जाना जाता है. महाराजा ने सैनिकों के द्वारा वृक्ष काटने के विरोध में 363 अन्य विश्नोई भी महाराजा के सैनिकों के हाथों से इसी तरह मारे गये. विश्नोई धर्म में वृक्ष काटना निषिद्ध है.

इस घटना से वातावरण उत्तेजित हो गया और वहां उपद्रव की स्थति हो गई. गिरधरदास भंडारी के नेतृत्व में वृक्ष काटने वाली पार्टी को भी इससे गहरा आघात लगा. वे अपना मिशन छोड़कर जोधपुर आ गये और महाराजा को पूरा घटनाक्रम बताया. महाराजा ने तुरंत वृक्ष रोकने का आदेश दिया और इस क्षेत्र को वृक्ष व जानवरों के लिए संरक्षित घोषित कर दिया.

खेजडली गाँव आज भी पर्यावरण प्रेमियों के लिए तीर्थ स्थल है यहाँ अमृता देवी और सभी 363 का स्मारक बना हैं. विश्नोई समाज की एक टोली जो विश्नोई टाइगर फ़ोर्स के नाम से जानी हैं वन्य जीवों के संरक्षण की दिशा में कार्य कर रही हैं. सलमान खान के हिरण शिकार की घटना को विश्नोई समाज ने ही उजागर कर इतने बड़े अदाकार को जेल की सलाखों तक पहुचाया था.

खेजड़ी वृक्ष की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से अपने प्राणों की बलि देना विश्व में यह अनूठी घटना है. खेजड़ली गाँव में अमृता देवी व शहीदों की स्मृति में अब एक स्मारक बना हुआ है. विश्नोई जाति के लोग हिरणों को भी इसी तरह से रक्षा करते है.

बिश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र में दिया जाता हैं

1730 में राजस्थान के खेजडली में 363 विश्नोइयों के बलिदान से प्रेरित होकर उत्तराखंड में चिपको आन्दोलन चलाया गया.

खेजडली मेला भरता में प्रतिवर्ष भादवा सुदी दशमी तिथि को (तेजा दशमी के दिन) भरता हैं

 

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