समान नागरिक संहिता से उलमा को दर्द क्यों …?

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समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ लग-अलग पंथों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ का मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों पर लागू होता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए केंद्र को इसे लागू करने के लिए समुचित कदम उठाने के लिए कहा है।
हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान समान नागरिक संहिता की जरूरत बताते हुए कहा कि इसे लाने का यही सही समय है। दरअसल, मीणा जनजाति से जुड़े इस मामले में पति हिन्दू मैरिज एक्ट के हिसाब से तलाक चाहता था, जबकि पत्नी का कहना था कि वह मीणा जनजाति होने के कारण उस पर हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को इन मुश्किलों से बचाने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि देश जाति, धर्म और समुदाय से ऊपर उठ रहा है। यह किसी भी पंथ जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है।

यह बहस इसलिए हो रही है क्योंकि इस तरह के क़ानून के अभाव में महिलाओं के बीच आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा बढ़ती जा रही है।
हालांकि सरकारें इस तरह का क़ानून बनाने की हिमायत तो करती रही हैं, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों की वजह से किसी सरकार ने इसे लागू करने के लिए कभी कोई ठोस पहल नहीं की है. समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं। देश में हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा। लेकिन जब भी समान नागरिक संहिता की बात होती है, उसके साथ ही ये बहस भी छिड़ती है कि मुसलमान इस कानून के विरोधी हैं. पर सवाल बड़ा है कि क्या देश का कानून किसी की धार्मिक आजादी में आड़े आ सकता है? क्या मजहब की आड़ में कट्टरपंथी अपना कानून थोपना चाहते हैं? 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। इस कानून के कारण धर्मनिरपेक्ष और मुसलमानों के बीच खाई और गहरी हो गई। वहीं, कुछ मुसलमानों ने बदलाव का विरोध किया और दावा किया कि इससे देश में मुस्लिम संस्कृति ध्वस्त हो जाएगी।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में दिए गए एक भाषण में कहा था, ‘किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि अगर राज्य के पास शक्ति है तो वह इसे तुरंत ही लागू कर देगा…संभव है कि मुसलमान या इसाई या कोई अन्य समुदाय राज्य को इस संदर्भ में दी गई शक्ति को आपत्तिजनक मान सकता है। मुझे लगता है कि ऐसा करने वाली कोई पागल सरकार ही होगी।’

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